नवरात्र के सभी दिन देवी को समर्पित हैं जहां अलग-अलग रूपों में उनकी पूजा की जाती है. इन पावन दिनों का चौथा दिन माता कुष्मांडा को समर्पित है. इस दिन शक्ति स्वरूपा मां जगदम्बा के इस स्वरूप की पूजा की जाती है जिनको जपने मात्र से सभी मनोकामनाएं पूरी होती है. स्वास्थ्य और बुद्धि विकास के लिए श्रद्धालु मां कुष्मांडा की पूजा करते हैं.
आज इस शुभ मौके पर आइए जानते हैं मां कुष्मांडा की पूजा की विधि, मंत्र, प्रिय भोग और उनसे जुड़ी कुछ अहम बातें.
मां कुष्मांडा का दिव्य स्वरूप
मां कुष्मांडा अष्टभुजी देवी है जो सिंह की सवारी करती हैं. उनके एक हाथ में कलश है तो दूसरे में पुष्प तो वहीं अन्य में सुदर्शन चक्र सुशोभित होता है. इस दिव्य रूप में परमेश्वरी देवी अपने भक्तों को आशीर्वाद देती है. उनकी पूरा करने से परम सुख और सौभाग्य की प्राप्ति होती है. उनकी पूजा की महत्ता के बारे में पुराणों में भी बताया गया है. देवी पुराण की मानें तो मां कुष्मांडा की पूजा स बल और बुद्धि का तेजी से विकास होता है.
मां कुष्मांडा की पूजा कैसे करें
मां कुष्मांडा की पूजा नवरात्र में पांचवे दिन होती है. इसके लिए भक्तों को ब्रह्म मुहूर्त में स्नान आदि करके स्वच्छ वस्त्र पहनने चाहिए. ऐसे में पीले अथवा लाल वस्त्रों को पहनना सबसे खास माना जाता है. इसके बाद पूजा घर साफ करके मां कुष्मांडा का स्मरण करते हुए देवी को कुमकुम, पीले रंग का केसर लगाना चाहिए साथ ही पेठे का भोग लगाना चाहिए. इसके अलावा कुछ लोग मालपुआ और बताशे भी चढ़ाते हैं.
इसके बाद पीले फूल, धूप, दीप, नैवेद्य और अक्षत आदि अर्पित करके मां की आरती करें. इसके बाद देवी का ध्यान करते हुए अपने मन की सारी मनेकामनाएं मांगे अथवा शांत होकर कुछ पल बैठे. इसके बाद दुर्गा चालीसा और दुर्गा सप्तशती का भी पाठ कर सकते हैं.
मां कुष्मांडा के पूजा के मंत्र
मां कुष्मांडा का ध्यान करते समय अधिक फल पाने के लिए उनके कुछ मंत्रों का भी जाप कर सकते हैं. माता रानी से जुड़े मंत्र कुछ इस प्रकास से हैं-
ऊं कुष्माण्डायै नम:
कुष्मांडा: ऐं ह्री देव्यै नम:
या देवी सर्वभूतेषु मां कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
ॐ कुष्माण्डायै नम:
ॐ जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते।
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