कालीमठ शक्तिपीठ देवी काली को समर्पित है, जोकि देवभूमि उत्तराखंड में रुद्रप्रयाग जिले के गढ़वाल क्षेत्र में स्थित है. यह स्थान समुद्र तल से 1800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है. यह इकलौता ऐसा मंदिर है जहां मां सरस्वती अस्त्र-शस्त्र धारण कर विराजमान हैं. यह देशभर का संभवत: एकमात्र ऐसा मंदिर है, जहां मां सरस्वती इस रूप में हैं. साथ ही इस शक्तिपीठ में त्रिशक्ति (मां महाकाली, मां लक्ष्मी और मां सरस्वती) अपने-अपने मंदिर विराजमान हैं. वैष्णो देवी मंदिर में यह तीन देवियां पिंडी रूप में हैं जोकि गढ़वाल के सबसे महत्वपूर्ण तीर्थ स्थलों में से एक है.
कालीमठ गांव अपने न केवल अपने निवासियों बल्कि पूरे का अत्यधिक पूजनीय स्थान है. प्रकृति की गोद में बसा यह स्थान अपने भक्तों को शांत, मनोरम, दिव्य और स्वास्थ्यवर्धक वातावरण देता है. यहां देश ही नहीं दुनिया भर से श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं. हिंदू धर्म ग्रंथों में भी इस स्थान का विशेष महत्व है जहां से जु़ड़ी हुई कई घटनाएं प्रचलित हैं.
कब जाएं कालीमठ मंदिर?
वैसे तो साल भर लाखों श्रद्धालु अपने आराध्य के दर्शन कर पूजा-पाठ के लिए पहुंचते हैं, मगर चैत्र और शारदीय नवरात्रों में यहाँ की रौनक देखते ही बनती है. कालीमठ मंदिर में देश ही नहीं बल्कि दुनियाभर से श्रद्धालु दर्शन के लिए वहां पहुंचते हैं. जहां विशेष कार्यक्रमों का भी आयोजन किया जाता है. इसके अलावा इस मंदिर के दर्शन करने का सबसे अच्छा समय सितंबर से नवंबर की बीच और शरद व मानसून के बीच का होता है.
मंदिर में ये चीजें खींचती हैं ध्यान?
रुद्रप्रयाग-गौरीकुंड राष्ट्रीय राजमार्ग पर गुप्तकाशी-कालीमठ-कोटमा-चौमासी मोटर मार्ग पर गुप्तकाशी से लगभग 10 किमी की दूरी पर कालीमठ मंदिर स्थित है. यहां काली नदी किनारे मां महाकाली का शक्तिपीठ है. इस मंदिर परिसर में मां महाकाली की प्रतिदिन विशेष पूजा-अर्चना होती है. यहां मां काली की मूर्ति नहीं है, बल्कि श्रीयंत्र की पूजा की जाती है, जो रजतपट से ढका रहता है.
पुराणों में है जिक्र
इस मंदिर परिसर में मां सरस्वती और मां लक्ष्मी के प्राचीन मंदिर है, जहां आराध्य की काले पत्थर की मूर्तियां हैं. विशेष यह है कि, यहां मां सरस्वती की मूर्ति अस्त्र-शस्त्र धारण किए हुए हैं, जो अन्य जगहों से अलग है. क्योंकि, अन्य जहां भी मंदिरों में मां सरस्वती की मूर्ति है, वह वीणा धारण किए हुए है. आचार्य दिनेश गौड़ बताते हैं कि, मां सरस्वती विद्या की देवी हैं. इस मंदिर की पुनर्स्थापना शंकराचार्य ने की थी.
कालीमठ मंदिर की मान्यताएं
कालीमठ में मां सरस्वती अस्त्र-शस्त्र धारण किए हुए विराजमान हैं. उन्होंने बताया कि देशभर में शक्तिपीठ कालीमठ एकमात्र मंदिर है, जहां त्रिशक्ति एक ही परिसर में अपने-अपने मंदिर में विराजमान हैं, इसके अलावा यहां देवी के चरणों के निशान भी मौजूद हैं जहां वर्षभर देवी भक्तों की भीड़ जुटी रहती है. स्कंद पुराण में केदारनाथ के 62वें अध्याय में मां काली के इस मंदिर का वर्णन मिलता है. ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर में सच्चे मन से मांगी जाने वाली सारी मनोकामनाएं जरूर पूरी होती हैं.
स्थानीय सहित जिले और बाहरी से देवी भक्त चैत्र व शारदीय नवरात्र के साथ ही अन्य मौकों पर यहां पहुंचते हैं और आराध्य देवी के दर्शन कर पूजा-अर्चना करते हैं. मंदिर के प्रबंधक प्रकाश पुरोहित बताते हैं कि कालीमठ पहुंचकर श्रद्धालु मां देवी मां के तीन रूपों के एकसाथ दर्शन होते हैं, जो दुर्लभ है.
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